Tuesday, September 2, 2014

Time: Long gone

A narrow
Uphill road
slithering like a sleek gray snake
through fleeting mist
Patting fresh greens
Like her
Fresh bathed palm
old stones
mute spectators to a time
long gone…

Creepers
like bystander villagers,
naive
With dangling talisman
In arms and waist,
Hallucinated or mesmerized
By the magic of visuals
Of the time
Long gone….

Willowing smoke
From deprived hearths
Spiralling around
Like warm hug
Pressing cleavages
Of fleshy times
Long gone….

My journey
To solitude
Is yet
So filled with you
Reflecting
Through each object
Crossing my view.
You
Who leaps within me
Like flares of pyre
Burning my wishes
To a singed desire
Of time
Long gone…..

(Mrityunjay)






Is this Love a Jihaad??


Presently my nation seems to be stung deep by the 'love jihad' bug which has spread like an unknown 'Ebola' virus. Origin - not known….. Purpose: very clear…. 

I wonder if this is to divert peoples' attention from that dirty phenomenon called 'rape' or to reorient the misogynistic moral-brigade to suit the modern tool of propaganda. By the time our cerebral media and intel brigade debates its semantics, gullible mass would be taken for a ride. it's like selling veneral disease with a catchy name of a candy. 

Issue is not of Hindu, Christian, jew or Muslim!… it is of that element of hatred that brews so much of barbarism…and it goes to such inebriating proportions that it doesn't really remain in the domain of a followed faith. I am sure it doesn't come from the respective religions; it is crafted elsewhere. 

in my village, way back sometime in 1975-76, when a Brahmin boy of a very respected family eloped with a local muslim girl (daughter of a Darzi who had entry to all our otherwise restricted 'janaanakhana' because of his sublime skill of stitching perfect fitting blouses for our ladies at home), the brahmin leader mobilised all kshatriyas along with dusadh, mushar and others of caste hindu (who otherwise didn't get to even sit in front of us) with a clarion call to punish the 'malechhas'. something very interesting happened. one of the poor brahmin family youngster informed that the girl was very fearful of eloping and it was the brahmin son who prevailed upon her to follow him. Many of these boys were the witness of the same in the local hat in a nearby village - a rendezvous for all and sundry belonging to at least 3-4 neighbouring villages. Not that my village folks didn't know it, but none had the courage to divulge the truthful account of that incident fearing backlash in the hands of this powerful brahmin clan which held irrevocable sway over the sentiments of gullible Rajputs (dominant in their size and might). Once the truth came out of a Brahmin boy, our Dusadh Mukhiya (quite a progressive feat for our village to have a 'Mukhiya' from a backward caste - thanks to the hold my uncle held over the local politics of the village and turned in favour of having a wise man leading the flock rather than a Rajput with his musclemen & cronies) took the lead and reasoned out the consequences of such rash and illegal action. Despite Brahmins' superior status and dubious notoriety, villagers turned in to favouring the Muslim family and the issue became of a collective honour as the girl too was a daughter of the village. ultimately, they were brought back, married happily and given a separate piece of land (both homestead and agricultural) to start their life afresh as responsible villager. Separation from family removed stigma from Brahmins having a blot, but property on which they settled on was all part of the rich brahmins. Their children (3 of them) gradually were accepted as part of the brahmins, though they could not perform rituals or earn making it a vocation (none of them were interested either). They studied in the village school, went on to study further in the capital with brahmin name and I remember one of them is a Deputy Magistrate in Bihar today. I hear when he goes to village, he visits his Nana-nani's family (both of them have since expired) and meets all his muslim folks in the local small mosque….. 


Now, Why i told you this story is to point out that one very simple act of sanity and courage changed the course of the ensuing violence without having any impinging affect on our respective faiths.  

माफ़ीनामा

My way of saying 'sorry' to those who are forced to regretfully wear the libellous existence of a 'community' to which we all belong….this is a kind of elegy to all those victims of sufferings inflicted in the hands of so-called 'moral policing' brigade....be it of any variety, any kind....at the end, all gets justified and rationalized by this community or that community.... this faith or that faith... the suffering remains as it is and keeps getting enlarged in its potential and intensity amidst a chorus of condemnation... so, finally....who does it, from whr does it get that venomous fang?

ये बात नहीं है
उस हद की
जो तुम हर रोज़ तोड़ देते ,
या मैं तोड़ देता हूँ।
ये बात नहीं है
उस ज़िद्द की भी
जिसके तहत
हम आपस में
एक-दूसरे का घर-दुकान जलाते हैं
और फिर
आस-पास के ख़ैरात वाले
कनातों में रहकर
टांग लेते हैं व्यापार
ग्राहकों का शिविर चलाकर
बेचने लगते हैं
धर्म-निरपेक्षता और सम्प्रदायिकता की
नयी-नयी किस्में।
बाकी तो सब ठीक ही है।
वो कहते हैं,
तुम कहते हो,
अखबरों में भी यही छपता है -
सब ठीक है।

किसी बच्ची के मुंह पर
कोई तेज़ाब फेंक जाये - ठीक है.
किसी बच्चे को नशीली दवाओं का
तस्कर बना दें - ये ठीक है.
बेटी को रंडी
और बीवी को रखैल बना दें -ठीक है.
बिना दवा कोई मर जाये,
या सड़क पर सोया-सोया
किसी शरीफज़ादे की कार तले
कुचल जाये -सब ठीक है.
अपनी शंकाओं
और हताशा से हतप्रभ,
विक्षिप्त
कोई ट्रीगर दबा दे - कई मर जाएँ -
ठीक है.
असले का व्यापार ज़ारी रहे - ठीक है.
हुम-तुम,
सब पर,
एक ख़ौफ तारी रहे - ठीक है.
फिर बात क्या है? किसकी है?
ओहो, माफ करना
तुम्हारे हाथ में तो व्हिस्की है!
शाम हो गयी क्या?
रात भी हो जाएगी
धीरे-धीरे
मुंह ढंक कर
सारी मानवता सो जाएगी।
तुम भी सो जाना
ताकि सुबह तक
दिमाग में ये मसले ज़िंदा न रहें
हम-तुम आपस में
शर्मिन्दा न रहें!

माफी मांगते-मांगते
हम परेशान हैं
हर सुबह
हमारे सामने
कुछ और टूटे मकान हैं
ना जाने कौन तोड़ जाता है
हमारे मकान रात में -
बारिश, बिजली, आँधी-तूफान?
लेकिन कुछ भी तो नहीं हुआ ऐसा
कल रात के दौरान.
दिन में तो सारा मुहल्ला
मातम और मिजाज़पुर्सी में
मेरे बगल में ही खड़ा होता है
फिर ये दोगलापन कौन ढोता है?

(मृत्युंजय)
३१ अगस्त, २०१४
कोलकता






दिल्लगी में

दिल्लगी में हमने उनका दिल दुखाया है, अपने सच से झूठ का पर्दा उठाया है .
एक किरकिरी जज़्बात की थी कल तलक क़ायम समय ने फूँक कर उसको अभी कल ही उड़ाया है।
बड़ा ज़ख़्मी था यूँ ही दिल हमारा उनकी बातों से किसी ने फिर इसे प्यार का नश्तर चुभाया है।
बड़े मग़रूर होकर हम चले थे जीतने जिसको उसी के आस्ताने पर सर अपना झुकाया है। (मृत्युंजय)

Tuesday, July 8, 2014

जागो


अब सोना
एक अदृश्य अँधेरे में खोना है,

बेतरतीब सपनों पर 
अठखेलियों में मग्न इच्छाओं 
और उनका गला घोंटने को आमादा 
जीने की सीमाओं 
पर सर रख कर रोना है।
अब सोना एक अदृश्य अँधेरे में 
खोना है।
जागो,
नहीं तो धकेल देगी ये भीड़ 
सपनों को भी कारागार में 
या बेच देगी तुम्हारी साँसें ही 
तुम्हें व्यापार में;
इसलिए जागो!
जागो,
क्यूँकि यहीं, कई 
प्रजन्मों को तुम्हारे रहना है,
तुम्हारे सपनों के मकबरे पर 
दीया तो जलना है!
जागो,
क्यूँकि इन प्रजन्मों को वो क़िस्सा बताना है,
जो आँच हमें खा गई 
उस आंच से बचाना है।
जागो,
क्यूँकि जयद्रथ अब मर चुका है 
किन्तु सूरज अभी डूबा नहीं है;
अभी कुछ और युद्ध बाकी है।
जागो,
क्यूँकि नीतियों के कई 
रिसते घाव अभी भरने हैं,
रीते हृदय में भाव अभी भरने हैं।
ऐसे भी
युद्धस्थल में सोना 
मृत्यु को निमंत्रण है,
बेवज़ह कारणों पर किया 
आमरण अनशन है।
जागो,
नहीं तो फिर पछताओगे 
अभिमन्यु की दशा पर,
संतानों को लील गई 
इस परिस्थिति बेहया पर।
कृष्ण माथा टेक कर बैठे हुए हैं 
काल के अनुचर यहाँ ऐंठे हुए हैं ;
छोड़ कर एक आहत साँझ 
दिन भाग गया है,
रात भी ठिठकी हुयी है।
सब अपेक्षा में हैं तुम्हारे जागने के,
जुलूस,नारे, विज्ञापन, प्रचार,
सिमटते हाट, चढ़ते बाज़ार,
अनाचार, अतिचार,
सब अपेक्षा में हैं तुम्हारे जागने के,
अब नहीं हैं कोई कारण तुम्हारे भागने के।

(मृत्युंजय)
१७.०७.२०१३
कोलकाता 

you & Me


You and me
inseparably together, I thought
would fill the horizon of life
with paints and words
of love and memories,
happiness in vagaries,
of a tale everlasting
filled with colours
of myriad emotions,
countenances and expressions,
of our wins and defeat
boasting of a proud feat,
of achievements and joy
of a trying destiny
played with us like a toy.
But alas, my Love!
I'm leaving now alone
into a void of solitude
with nothing to write about,
and nothing to paint on.


-Mrityunjay-
 30.10.2011

झेलम

झेलम


एक ऐसे समृद्ध भू-भाग में
प्रकृति जहाँ कल्पना के बिम्बों-सी
रचती है हर पल एक रचना,
झेलम,
तुझे ही नहीं आया बचना?
काली-करैल मिट्टी के तटों से बँधी
कृशकाय काया में उमड़ता मटमैला जल
जैसे नाचता कोई नीम-पागल।
हंसी उड़ाते, संग भागते
लम्बे पोप्लार के पेड़ कतार में,
सुना है उनकी भी नस्ल डुबो दी
तुम्हारे लोगों ने व्यापार में।
सिरमौर तुम्हारी बर्फीली चोटियों पर
अहर्निश चलती है
फौजी बूटों की उठा-पटक 
लगी रहती है उनको
घुसपैठियों की भनक।
झरनों के छलकते यौवन में
अब अल्हड़पन कम
धधकती विपुल वासना,
अबोध हवस का तम
पशमीना, सेव, अखरोट,
नक्काशी भरे हाथों की ओट
में सर्दियों की कांगड़ी की तरह
छुपके पनपते अंगार
आराम देने की आड़ में
रोग-व्याधि के आगार।
झेलम,
सुना है अतीत में
कबीलों से लेकर मीलों तक
प्रेम की सदाशय लहरियाँ गाते
झूमते बौद्ध, हिन्दू, ईसा के अनुयायी
यहूदियों की कुछ खोयी
टोलियाँ भी यहाँ आयीं।
सतलज, चेनाब और रावी के संग
तुमने घोले बड़े सारे रंग;
फिर ऐसा क्या हुआ इतिहास में
कि सबकुछ परिणत हुआ परिहास में?
झेलम,
पूजा करके कोई खून करे
या नमाज पढ़के जिबह,
बढ़ता है दोनों से कलह।
इसी कलह की प्रताड़ना में जल
सूख कर तुम बन गयी
नदी से नाला,
तुम्हारी घाटियों में भी
भर गया है इस देश का घोटाला।
नहीं तो सभ्यताओं का पोषक तुम्हारा जल
यूँ विष की तरह काला  क्यूँ होता,
तुम्हारे घरों में पका सुस्वादु वाज़वान
किसी और का निवाला क्यूँ होता।

                            (मृत्युंजय)
                             ७ जून २०१३
                              श्रीनगर 

Schism


Do I suffer from a breach

In what I believe in
And what I do?
For, be it my inheritance
Be it my association with you
I have been doing
Exactly what you did
May be worse,
Due to the world around
Turning more complicated and terse.
Rains do not remind me
Of that folk rain-dance
Chirping birds scare me
With their sweet stance,
Sky stands in ire
Your love makes me tired,
Mornings I sleep
And nights I wonder,
Did I have a nightmare
In those tingling thunder
That I dreamt of?
Awoke, and dismissed
Like my father's monotonous sermon
Of his expectations from me.
The plumage on my window
Of my mother's secret love
Indifferently cleaned by a savage shove
Of racing winds reaching crescendo.
I watch, as you did
Bewitched, Affairs sordid.

(Mrityunjay)
28.06.13
Kolkata

सुबह अदाओं वाली











हर ओर नीरवता 
सरसराते, धींगा-मुश्ती करते 
शाख़- पत्ते 
रंगों के विनिमय में लगे 
फूल 
उन सारे, कल के टूटे
दलों को भूल
घाटी में चक्कर काटती
हर दिशा से गुदगुदाती हवा
उनपर लटक कर झूलती
फाहों-सी बादलों की टोली
पक्षियों के वार्तालाप
रह-रह कोई ले रहा आलाप
तितलियों की अठखेली
भवरों की मुखर बोली,
सुबह अदाओं वाली…..

(अम्बूटिया चाय बगान में)
मृत्युंजय
१५ जून, २०१४


रात कचोटती है


फिर आकाश ने
छोड़ रखा है चाँद को
टहलता हुआ,
जैसे एक मुखबिर, एक जासूस
रात कहाँ - कहाँ
कचोटती है
करके महसूस
वो दिन को बतायेगा.
फिर भरे जायेंगे
कुछ शरीर जेल में
कल
समय
तारीख बन कर
वो फैसला सुनायेगा
जो कभी भी
उनके हक़ में नहीं होगा
जिन्हें रात कचोटती है.
मरी हुई शक्लें
बुझी हुयी यादें
सुलगते सवाल
कुछ ना कर पाने का मलाल,
पटक कर चला जाता है
परेशानहाल, सांझ का कलाल
रात के ओसारे पर.
सम्बन्धी होने के नाते
रोते-बिसूरते
कुछ लोग
रहते हैं तब तक
जब तक
उन्हें ये समझ नहीं आ जाता
कि
वो मुर्दा अगोर रहे हैं.
पर दोष तब तक
चढ़ चुका होता है
उनकी आत्मा पर
और रात
भाँप लेती है
उन सबका मर्म
जिनका लहू
अभी भी है गर्म.
कल ये सब
फटकारे जायेंगे
दिन में,
आँखें जिनकी लाल हैं
रोने से,
अपने सम्बन्धियों को खोने से.
इन सब का हिसाब होगा;
फिर गणित
गिनेगा
अंकों का सिलसिला
कितने फीसदी, कौन सी जाति
कौन प्रदेश, कौन सी प्रजाति
सुवर्णी, कुवर्णी या हरिजन,
दलित-मलित, जोलहा
अहमदिया या किरिस्तान,
खान, पठान, अंसारी
सबकी आएगी बारी,
पगड़ी वाले सिख
या कटे केश का मोना
सबको पड़ेगा रोना,
क्यूंकि
इनमें से सब थे
कल रात मुर्दा अगोरते
सबकी आँखें हैं लाल.
(Mrityunjay)
8 july, 2014

Wednesday, March 19, 2014

Baarish From Via Darjeeling (2008)







This piece of music (sung by Chitra of 'Awara Bhanwre…' fame) is part of a NFDC film 'Via Darjeeling' (2008). I wrote 2 of its lyrics and co-composed this song with composer Prabuddha Banerjee. Unfortunately, the film didn't make much news and the music too got silenced as there was no album released - financial constraints...... felt like sharing for its unique quality of poetry & music as well as fate. 



Any comments please??


Monday, March 17, 2014

होली की शुभकामनाएं मित्रों!…

                                                                 
सारे रंगों का साथ हो गया
इतना कि अनुपात खो गया।
                                                                 
पकड़ा गोरी को रंग लगाने 
                                                                 
तो निकला उसका भाई,
सबने इतनी भंग पिलाई!


Sunday, March 9, 2014

ये जंगल है (It's Jungle)

आपस में लिपटे 
तरु, लता, जड़ें, वल्लरियाँ 
समन्वय की अनगिनत लड़ियाँ 
धूप, हवा, छाँव,
टूटे, टेढ़े, खड़े - जैसे भी हो पाँव 
सबमें निर्झर-सी बहती साझेदारी।
ये सभ्यता का नगर नहीं है
ये जंगल है,
यहाँ सब कुशल-मंगल है।



Friday, March 7, 2014

निर्वाचन- वसंत


बुरा न मानो होली है!

निर्वाचन की घोषणा ने जैसे वसंत में और उष्मा भर दी। होली के लिये तैयार नेता और उनके चाहने वाले सब आपस में पहले दिन ही भिड़ गये। तो क्या हुआ, यदि रंगों की जगह पत्थर, प्लास्टिक कुर्सियाँ, झाड़ू और पता नहीं कैसे-कैसे लोक-परंपरागत टुकड़े फेंके गये एक-दूसरे पर। लग रहा था कोई फिल्मी या टीवी चैनल का आकर्षक प्रचार हो जहां एक ही परिवार के लोगों के बीच एक दीवार खींच गयी थी और अब उस दीवार को लोग हटाने में लगे थे। याद आया?…."भैया ये दीवार टूटती क्यूं नहीं?…." थोड़ा अपनी दृष्टि कैनवस को और बड़ा कर के देखा तो और भी महान चित्र सामने उभर कर आया। मुझे लग रहा था जैसे पार्श्व में गाना बज रहा था: "जै-जै शिवशंकर, कांटा लगे ना कंकड़, कि  प्याला तेरे नाम का पिया।…" और सामने उसी मिजाज़ और ताल पर चल रहा था होली का हुड़दंग। बिल्कुल सही!….अफ़रा-तफ़री, मारा-मारी, पर कहीं भी हिंसक विद्वेष का कोई चिन्ह नहीं। टीवी चैनल वालों का कैमरा सबूत था और नाच-नाच, घूम-घूम तस्वीर-ए-हाल दिखा रहा था; कोई लहूलुहान सड़क पर नहीं पड़ा, किसी को कोई एम्बुलेंस में नहीं खींच रहा। वॉटर-कैनन (जल-कमान) आया तो और भी वाह-वाह मच गयी। दो-चार इस मोटी पिचकारी कि थपेड में आ कर लुढ़के ही थे कि छलाँग लगाकर एक ने उस भारी -भरकम पिचकारी को भी थाम लिया। वर्दी धारी भी हो गये पानी-पानी।

सारे देश में तहलका मच गया कि ये कैसे संस्कारहीन लोग हैं। होली के पहले ही पानी, रंग और धींगा-मुश्ती में जुट गये। अरे, पहले थोड़ी 'जोगीरा' होनी थी लोमहर्षक फिकरों के साथ, जम कर मन कि भड़ास निकालनी थी उन देवियों के प्रति जिनको फैंटसी में लिये हम साल में बस एक ही दिन तो मुँह खोल पाते हैं- जैसे "… पापिया जब है नाम तेरा, खूब पाप तुम किया करो, रात को खेलो खूब कबड्डी, दिन में जाप किया करो…. हो जोगीरा सररर... " या फिर उन महानुभावों के प्रति जो अक्सर अपने दर्शन से ही हमें टीस-सी मार जाते हैं, मसलन - "… आलू ना प्याज, खाली-खाली ब्याज, मुँह तोप के मूल खा गये, पण्डित जी महराज ….हो जोगीरा सररर .…" 
त्योहार, नशा और लुच्चापना - यदि यही है हमारे निर्वाचन का स्वरूप तो फिर हमारे गाँव की कीचड़-कादो वाली होली को क्यूं कोसते हैं लोग??

(मृत्युंजय)
५ मार्च, २०१४ 
कोलकाता 

Tuesday, March 4, 2014

नमक की तलाश

ज़मीन पर 
खेतों की तरह पसरा हमारा कुनबा 
आसमान से 
खंदकों में भरा गंदा जल दिखता है
जिसके नंगे, मांसल नितंब को 
चाटती रहती है 
बालू के शरीर वाली
हरा-काला जीभ लपलपाती, नदी।
सभ्यता की जननी को
मानवों की संगिनी को
अब नमक की तलाश है।
*********************
(मृत्युंजय)

Monday, December 30, 2013

सर्दी

सर्दियों से न जाने क्यूँ 
याद आता है ज़ुकाम,
ठहरा हुआ, रुका हुआ, सारा काम.
दादी का कफ़ से खरखराता गला, 
पिता का धोबियों से 
पटके गए कपड़ों कि तरह छींकना,
दादा जी के गळगळाते गरारे,
बहती नाक से परेशान
कपड़े के बाजू,
आँखों में खीझ सम्भाले
बिना बताये सरक आयी शाम,
ठहरा हुआ, रुका हुआ, सारा काम.

खेतों पर सहम कर फैली
गाँव के चूल्हों से बही
धुएँ की ओढ़नी,
मुँह पर पड़ने से
खाँस-खाँस हलकान
खेत अगोरता, मँगरू पहलवान
खुजला रहा,
ऊब से चिनकती अपनी चाम,
ठहरा हुआ, रुका हुआ, सारा काम.

रज़ाई की गठरी से झाँकती
नानी की आँखें
टोह रही,
ठंढ के सिकुड़ने का
बाट जोह रही.
प्रातः की गायी जाने वाली पराती
ऐसे ही नहीं छोड़ी जाती;
कँपकँपाते अन्तर में
थरथराता राम का नाम,
ठहरा हुआ, रुका हुआ, सारा काम.

(mrityunjay)

ये मेरा प्रेम है! (Love taught me to lie)

Love taught me to lie.....



ये मेरा प्रेम है!
मुझसे झूठ बुलवाता है 
बातें छुपाता है,
हर दिन नयी जुगत भिड़ाता
मेरे सत्य को 
पाखण्ड से पिटवाता है,
ये मेरा प्रेम है!

कभी परिवार, कभी संसार
कभी समाज, कभी देश
के नाम पर
त्याग की भावना जगा
यह केवल समझौता करवाता है
प्रवंचना का
बहुरूपिया मुखौटा लगाता है.
ये मेरा प्रेम है!

उन्माद की प्रजातियों के
बिरवे कि तरह
चढ़ जाता है
किसी भी मोह के वृक्ष पर
बढ़ जाता है;
शोषण को पोषण समझ

प्रतिकार के स्वर को भी
रह-रह दबाता है.
ये मेरा प्रेम है!

Friday, November 29, 2013

ले, मेरी साँसों की अंतिम भेंट ले!

धुँध से मैं आ गया हूँ मुक्त होकर 
ले प्रिये तू गोद में समेट ले!
छोड़ आया हूँ जगत का द्वंद्व सारा 
ले मेरी साँसों की अंतिम भेंट ले!

साक्षी हैं तेरे-मेरे बीच पलते
यातना में भी निरंतर भाव फलते,
फूट बिखरे सपनों में प्रेम को लपेट ले,
ले, मेरी साँसों की अंतिम भेंट ले!


(Mrityunjay)

কি যে আমার পরিনতি


পুর দিন বামাক্ষেপার গান শুনে
কি ভাল লাগে?
কিংবা, রবীন্দ্র সঙ্গীত
শুনে কি পথ হারার ভাগ জাগে?
চেয়ে-চেয়ে আকাশ দিকে
পাই শুধু শূন্য,
নাই বুঝি পাপের গতি
নাই করি কোন পুণ্য।
ভাল-মন্দ -
যেন দাদুর যুগের গল্প,
পুজো-তীর্থ -
যেন আকর্মন্নের প্রকল্প;
আমি যে আছি
তাতে ই বা কার উপকার
আমি যে চলে যাব
ক্ষতি ও বা হবে কত কার?
দগ্ধ বৃদ্ধের মতুন
খাঁ - খাঁ করে দিন
আর চলন্ত খালি ট্রামের মতুন
রাত করে চিত্কার।
ভিক্ষের পাত্র নিয়ে
জ্যোত্সনা নামে শহরে
ছাদ থেকে পড়ে
নালার আবর্জনার হাথ ধরে
ডুবে যায়ে সাগরের গভীরে।
আমি ছুটে-ছুটে
ধরি শুধু ছায়া,
দুই ফোটা জলে ভিজিয়ে
রাখি তার ধবল স্মৃতি,
জানি না
কি যে আমার পরিনতি।

(মৃত্যুঞ্জয়)
কলকাতা
২৫.১১.২০১৩