ज़मीन पर खेतों की तरह पसरा हमारा कुनबा आसमान से खंदकों में भरा गंदा जल दिखता है जिसके नंगे, मांसल नितंब को चाटती रहती है बालू के शरीर वाली हरा-काला जीभ लपलपाती, नदी। सभ्यता की जननी को मानवों की संगिनी को अब नमक की तलाश है। ********************* (मृत्युंजय)
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