Monday, June 8, 2020

तुम क्या करोगे अब?

मैं नहीं डरा किसी बीमारी से
बुझ रहे अपने चूल्हे से, बेकारी से

मैं नहीं डरा किसी महामारी से
सब पर छायी लाचारी से

मैं बेघर नहीं हुआ कभी
क्योंकि दूर एक गाँव में मेरा घर है
वहाँ मेरा परिवार बसता है
जिसका हाथ सदा मेरे सर पर है

मुझे नहीं चाहिए कोई गाड़ी
जो मुझे भेड़ों की तरह लाद कर
मुझे मेरे घर पहुंचाए
मेरे घर वाले मुझे देख कर
सदमे से भर जाएँ
और उनका आत्मसम्मान
मुरझा जाए

अपना राशन मैं ख़रीद सकता हूँ
ठीक वैसे ही
जैसे तुम्हारे रास्ते, मकान और उद्योग
हमने ठीक ही बनाए
तुम्हारे दिए अल्प में ही
सम्मान से जी पाए

मैं मेहनतकश हूँ
खट कर कमा सकता हूँ
दाम चाहे जितना भी कम हो
अपना सिक्का जमा सकता हूँ

मैं कोसों पैदल चल सकता हूँ
मिट्टी मेरी अपनी है
हर लोहे को जनने वाली
भट्ठी मेरी अपनी है

संसाधनों को चूस कर
जो बची है संठियाँ
उससे ही मेरा चूल्हा
जहां कहीं भी जल जाता है
मेरा काम चल जाता है

मुझे पता है
तुम फिर बुलाने आओगे मुझे
हर उस काम के लिए
जिससे तुम्हारा बाज़ार बंद पड़ा है

हरसिंगार का मौसम फिर आएगा
फिर खिलेंगे पलाश, तुम्हारी लालच के
और मैं निरंतर सींचती नमी की तरह
तुम्हारे ग़ुलाब भी सीचूँगा
हरसिंगार और पलाश भी,
कैक्टस सब
मेरे साथ ही रहेंगे
क्योंकि उनकी तनाओं में ही
सुरक्षित रहती है मेरी नमी
जो मेरे तन को मरने नहीं देती

तुम बताओ,
तुम क्या करोगे अब? 

जवाब मत देना



तुमसे अगर कोई सवाल पूछे
तो जवाब मत देना
जवाबों के 
कई पहलू निकल आते हैं आज कल

क्या पता
तुम्हारे विचार
उस पड़ोसी से मेल खा जाएं
जिसे लोग सनकी कहते हैं
यह भी कहते हैं लोग
कि वह दिन भर सोता रहता है
कोई काम नहीं करता
रातों को जुलूसों में जाता है
और जब जुलूस थक कर लौट जाते हैं
तब भी वह वहीं बैठा 
एक और जुलूस की अपेक्षा करता है

वह अख़बार नहीं पढ़ता
अख़बारों को बेच कर
झाल-मूढ़ी खाता है
जुलूसों से इस झाल-मूढ़ी का
पुराना एक नाता है
फिर भी उसे लोग
संस्कारहीन कहते हैं
वह परंपराओं को नहीं मानता
उसकी आंखों के कोरों पर
जमा रहता है धुंआ और राख
नालंदा में जली क़िताबों का
उनके साथ जली बुनियादों का

यह भी हो सकता है
कि तुम्हारा जवाब
किसी ऐसे से मेल खा जाए
जिसे लोग देशभक्त कहते हैं
फिर तो ख़ैर नहीं तुम्हारी
तुम्हें बताना पड़ेगा 
वह कारण
जिसने बाबरी मस्जिद तोड़े
जिसकी चपेट में गांधी क्या
और क्या अम्बेडकर
रख दिया जिसने
सबको भेद कर

एक और भी है
जिससे तुम्हारे विचार मेल खा सकते हैं
लेकिन वह अपाहिज है
उसे कोई किसी में नहीं गिनता
वह रेत पर सपने बनाता है
और हवा से उसके नक्श गढ़ता है
वह ख़ुश है
क्योंकि दुःखी होने की
कोई वज़ह नहीं दिखती
वह केवल बामियान में टूटी
बुद्ध की मूर्तियों पर रोता है

एक और सूरत भी हो सकती है
तुम्हें शायद अपना जवाब
वापस लेना पड़े
तो ले लेना
क्योंकि उसे ही लोग 
सभ्य व्यवहार कहते हैं
विचाररहित भावों का
यथोचित संचार कहते हैं।

(मृत्युंजय)

कोरोना को दिखायें दीया!



सुनो सुनो
एकांत ने
शोर का गिरेबां पकड़ लिया है
हवा
उसके तन पर जमा गर्द झाड़ रही है
और कल तक सड़क के कोने से चिपका
मरियल खौराया कुत्ता
बीच सड़क पर अंगड़ाई ले रहा है

उसके दिखते ही
उसे दौड़ा लेने वाले कुत्ते
बागों में कबड्डी खेल रहे हैं
सुबह की सैर और वर्जिश वाले मनुष्य
छुपा कर मुँह
तरह तरह के नक़ाबों में
एक-दूसरे से छुपते फिर रहे हैं।
एक दीया
इस विडम्बना के नाम! ...

ख़लील चिक के
मांस की दुकान के बाहर
कई दिनों से
एक बकरे का सर रखा है
जिसकी आंखें खुली हैं
और ऐसे चमक रही हैं
जैसे दुकान की बंद पाटों के नीचे से
सर निकाल कर
बाहर की दुनिया का मुआयना करता
वह बैठा हो।
एक दीया इस भ्रांति के नाम भी! ...

सुना है
भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या
उन लोगों की मृत्यु के बराबर हो गयी है
जो इससे डर कर
भूख और बेकारी
अपनी पीठ पर बांधे
अपने गांवों की तरफ भागे थे
पता नहीं किस चीज़ से हलाक़ हुए
रास्ते में
कोरोना से मरने की ख्याति उन्हें नसीब नहीं हुई
एक दीया
उनकी आत्मा की
शांति के नाम भी!....

(मृत्युंजय)

The Ballad of Lock down

The Ballad of Lockdown

Deserted roads, narrow and wide
Slithering across the city are lost among possession  
Of silent cyclones and screaming deserts.
Patting wrinkled leaves of green grass, I walk
Through the buildings - old and new
Watch inmates behind closed doors
Rewinding clock to a time long gone.

Creepers like bystander villagers
Hallucinated by the scent of virus
Grow wild in my arms and waist
I cherish walking back to your infected blood vessels
Taste the rain-wet solitude, and
Slowly peel cleavages of fleshy moments of suffering.

  I remember you yoked your lips to my bones
 Talked so much about me, and  
 the pandemic prison camps in the city
filling me with flavoured flares of funeral pyre.
Our friends weep when they see outlaws
Digging burnt gold-ashes from our graves of misadventures, and
Feeding hungry butterflies walking barefoot in our beloved city.

You and I know
The pathogens are so wise
They speak no lies, only inject   
 Silent and simmering hopes into our vacant souls.


.(Mrityunjay)

कोरोना-समय गीत


शांत पड़ा है सब कुछ 
एकांत बड़ा है, सन्नाटा है
जीवन पर छाया भाटा है
चेहरों पर सबके भय है

मानव में कितनी मानवता
जीवन में कितना लय है
यह तो अब जा कर जाना 
जब चारों ओर प्रलय है

लेकिन, जब ऐसा होता है
जीवन का सब कुछ खोता है
साथ नहीं कोई संगी कोई
दिन भी रातों-सा रोता है

ऐसी मुश्किल में पीड़ा में
कौन हमारा दुःख ढोता है
जितना भी मुश्किल हो जीना
जीने की आहट देता है

ऐसे में दिल ही ईश है अपना
लड़ने की हिम्मत देता है
कहते हैं, हम सब के अंदर
सुधा भरा एक दिल होता है।

(मृत्युंजय)

नालंदा के प्रति

बहुत करुणा जगी
तुम्हें देख कर बुद्ध,
उस कब्रगाह में
जहाँ तुम्हारी स्मृतियों का भग्नावशेष
सैलानियों का आकर्षण है

वहाँ के बाग़ में भी मुझे
बहुरूपी खाद्य के पैकेट दिखे
और विभिन्न पेय की खाली बोतलें

दूर बमियान में भी अब
वही सब दिखता है
और हाँ,
कुछ और बीभत्स रूप से
टूटी हैं वहाँ की मूर्तियां
सुनते हैं
तराशे गए पत्थरों में
कीलों के बज्र जैसी चुभी
गोलियाँ

नालंदा के समय
गोला-बारूद नहीं था न
इसलिए उसे
घोड़ों और तलवारों से रौंदा
किसी खिलजी ने
पुस्तकालय में आग भी लगाई
सुनते हैं, जो महीनों तक नहीं बुझी
अज्ञान ने ज्ञान की चिता जलाई

फिर कुछ पंडितों ने
भिक्षुओं के सर भी तो कटवाए
अशर्फियों का लालच दे कर
लालच ने स्वाभिमान को भी पालतू बनाया

एक नया नालंदा विश्वविद्यालय
बन रहा है समीप ही
वितंडा और कुचक्र के धूल के बीच
उसको भी हम रहे सींच
क्योंकि हमें कुछ और खंडहर चाहिए
कुछ और स्मारक
सैलानी हर दिन बढ़ते जा रहे हैं

जैसे मिट्टी में फूटते ही
जीवन के अंकुर, दब जाते हैं कभी-कभी
परत-दर-परत
बेज़ुबान सभ्यताओं के 
ऐसे ही रहे हैं
कदाचित प्रतिमान

सोच रहा था यही कुछ
सोच रहा था, कि कैसे
नए प्रजन्मों को बताऊंगा
कि तभी
शैवालों के बीच दबी
ईटें, समवेत स्वर में कह उठीं -
"मैं ज्ञान हूँ
मैं ध्यान में हूँ!"

अचानक दिखती है
हवा में उठती
धुएं की एक लकीर
जिसमे फंसी जले हुए ज्ञान की
खुरदरी तलहथियाँ
मेरे गालों को सहलाती
देती हैं चीर,
ज्ञान
अभी भी सुलग रहा है
पुस्तकालय में नहीं
तो उसकी परिधि में बसे
एक-झुण्ड गावों की
रसोई के चूल्हों में
लेकिन वह सैलानियों के फोटो में
नहीं आता ...
ज्ञान भूत है
कैमरे में नहीं समाता

टूटे अंगों से भी ध्यानस्थ
नालंदा के बुद्ध
बमियान के, उतने ही टूटे
बुद्ध की प्रतिमा से कहते हैं
"यहाँ से वहाँ तक
सभ्यता की एक ही निशानी है भंते!
तृष्णा, ईर्ष्या, हिंसा
अराजक प्रकृति की अविराम मनमानी है भंते!"....
मेरे पदचाप के नीचे
फिर से कोई फुसफुसाता है -
"बुद्धम शरणं गच्छामि
धम्मम शरणं गच्छामि!..."
किन्तु
इस बार किसी ने नहीं कहा -
"संघम शरणं गच्छामि!"

(मृत्युंजय)

Monday, December 23, 2019

बची न कोई आस

नयनाभिराम कुछ बादलों की टोली
जब गढ़ रहे थे क्षितिज पर रंगोली
सूरज जब जुटा रहा था रंग
धरा पर हो रहा था दिन का कौमार्य भंग
एक अंधेरे के हाथों
जिसके फैलते ही 
शर्म से सब हो जाता है काला
चाहे वो गुरुत्वाकर्षण की धनी धरती हो या 
अंतरिक्ष भर असीम नील-वर्ण गगन
लहराते सागर की अदम्य जल-शक्ति
या ऊर्जा से फड़कता उसका रोष सघन
बस आर्तनाद-सी कौंधती है 
एक ध्वनि रह-रह
जो हरहराती आती है वहशी हाथों की तरह
और फेंक जाती है एक लिबास 
अंतिम चिन्ह 
अब नहीं बची कोई आस।

(मृत्युंजय)

Tikuli se Tikuli badali le Bhauji ....

This traditional Bhojpuri Biraha was presented during the 10th AAKHAR Bhojpuri Festival at Panjwar, Siwan... it was part of Mrityunjay Singh's lecture on 'Bhojpuri Diaspora & Lok-geet'... Shri Prabuddha Banerjee, renowned Film fare awardee music composer & Director of West Bengal, has added an esoteric element to the song with his UKULELE strings... The video is courtesy Poet and singer Sushant Sharma. Enjoy the lilting melody and folk essence of the song.

Wednesday, March 6, 2019

संस्कृति की नदी

अकस्मात् देख रहा हूँ
बुरादों-से भुरभुरे लोग
हथियारों में परिणत हो गए हैं
और दीमकों की बामी
लिजलिजे केंचुओं से भर गयी है,
मवेशी देवताओं को खदेड़
गर्भ-गृह हथिया कर बैठ गए हैं
और देवता
निराकार, अदृश्य 
आकाशवाणी की तरह 
सुनने वाले कान ढूँढ रहे हैं,
भगोड़ा चाँद 
त्योहार में घर लौटने की
अर्ज़ी लगाए बैठा है
संततिहीन लोगों के इजलास में
नदियों का नमन करने उतर आये हैं
बादलों से झूम-झूम झरते
विनाश के वृत्त -सा
मुँह फाड़े 
विकास के काले करैत
खेद रहे हैं मीलों तक
करैल कीचड़ में सनी 
छलछल उछलती, तड़पती मछलियाँ,
लचीले अजगर-सा काढ़े परिधि
क्षितिज पर का आसमान 
पड़ गया है साँवला,
रात लेकिन 
भर गई है उजास 
उन्मत्त मद्यप, बेरोज़गार
उत्सव मना रही है
तीली जलाकर आस,
नदियों के तटों पर
लाशों का 
शेष-क्रिया सम्पन्न कर
उलीच रहे हैं लोग
सारा कूड़ा-करकट
प्रजातंत्र की
कृशकाय नदी में,
बहती जा रही है नदी
अपने सतह पर
थरथराते सपनों का
प्रतिबिम्ब गढ़े
इस आस में 
कि चाँद
लौट सके अपने घर,
मवेशी अपने स्थान पर,
देवता अपने गर्भ-गृहों में
और
मछलियाँ
काले करैत के जबड़े से
बच कर
नदी के प्रवाह में,
जिसमें पानी
बस घुटने भर ही रहता है
संस्कृति का भस्म
इसी में तो बहता है।

Tuesday, February 12, 2019

'गंगा रतन बिदेसी' (भारतीय ज्ञानपीठ) भोजपुरी उपन्यास

मृत्युंजय द्वारा रचित 'गंगा रतन बिदेसी' (भारतीय ज्ञानपीठ) भोजपुरी उपन्यास सौ वर्षों की काल-परिधि में घिरी, अपनी ज़मीन से उखड़े हुए लोगों की गाथा है। यह उस दुःख, संताप और संघर्ष की कथा है, जो भोजपुरिया क्षेत्र से विस्थापित होकर गिरमिटिया बने एक व्यक्ति के परिवार और संततियों को फिर से अपनी जड़ खोजने और जमाने के दौरान सहन करना पड़ा। आज भी, अपने देश में,  सौ में से दस लोग ऐसे हैं, जो अपनी रोजी-रोटी कमाने या एक अच्छे जीवन के चक्कर में अपनी ज़मीन से प्रताड़ित या निष्कासित जीवन जी रहे हैं। अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी यह बात उतनी ही महत्वपूर्ण है।
यह कथा है उन सब लोगों की जो आपस में एक आंतरिक प्रेम की जिजीविषा से बंधे हैं, और इज़्ज़त से जीने को एक जगह खोज रहे हैं।

इसके लेखक मृत्युंजय स्वयं पश्चिम बंगाल कैडर के एक आई.पी.एस. अधिकारी हैं, जो संप्रति पुलिस महानिदेशक (होमगॉर्ड), पश्चिम बंगाल के पद पर कार्यरत हैं।

मृत्युंजय आधुनिक भोजपुरी लेखन पर चर्चा करते हुए हाज़िर हो रहे हैं ज्ञान भवन, पटना में 1 फरवरी 2019 को पटना लिटरेरी फेस्टिवल का हिस्सा बन कर। यहाँ अपने उपन्यास गंगा रतन बिदेसी के प्रसंगों और संदर्भों पर तो चर्चा होगी ही, साथ ही आप सुन पायेंगे उनका विरल भोजपुरी गायन जो इस उपन्यास का हिस्सा है। जल्द ही यह उपन्यास अपने ऑडियो-पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध होगा।
 amazon.com पर 'Ganga Ratan Videshi' के टाइटल से यह उपन्यास उपलब्ध है। 

आपका स्नेह और सहयोग मेरी प्रेरणा भी है, और साहस भी। ....    

                                  




Ganga Ratan Bidesi by Mrityunjay - A Jnanpith Publication, New Delhi

'Ganga Ratan Bidesi' is a saga spanning centuries, continents and generations of indentured labour sent far away near exile to South Africa by the British. Devastated by the effect of Permanent settlement of Lord Cornwallis most of the farmers of small-holding became landless and came under the draconian claws of Zamindars who extracted everything they could to feed their British masters and to fill their coffers. On the other hand, all black slaves had deserted their respective farms and mines owned by British colonial masters after the Slavery was formally abolished. Their enterprises needed skilled labour immediately. Indian sub-continent was further impoverished due to its rising population, forcing a large section of landless labour to drift to other sources of livelihood. British intermediaries lured them to go to their far away colonies of British in lieu of a guaranteed home, remuneration, health services, and as a whole a better life. 

One of such ill-fated farmer was the great grandfather of Ganga Ratan Bidesi who was loaded along with with many like him in the Ship 'Truro' in 1860 and sailed to Natal ( South Africa) to work in sugar cane farms of the British colony. Hence, begins the most treacherous and trying life of this dislocated family which lands successively in one trap of exploitation to the other.

Set in the backdrop of the Indigo cultivation and the resultant landlessness of the peasants, this novel spans the freedom movement with a focus on Gandhiji’s metamorphosis from an activist in South Africa to a Mahatma in India. The tale meanders through many places, movements, lives of people and circumstances which surround this dislocated family for generations.

Ganga Ratan Bidesi culminates in present day Bengal and Bihar. With exquisite beauty and poise, Mrityunjay paints a picture of Calcutta and Howrah through the decaying decades, yet resplendent with life and hope.
Above all, Ganga Ratan Bidesi signifies the triumph of love over all else, despite being strangled by an unending misery.

The Bhojpuri novel is available on Amazon.com with the title 'Ganga Ratan Videshi' by The Jnanpith, New Delhi.


Wednesday, July 18, 2018

तुम

महज़ ख़याल ही नहीं,             
शोर-शराबे से भरे मुझमें               
एक स्थिरता हो तुम,                    
जो जड़ में अनुपस्थित हो कर भी 
मेरे चेतन को हिलाता रहता है          
इस ज़माने से लोहा लेने का 
हौसला बढ़ाता रहता है।

क्षितिज पर बेलौस पसरी
लालिमा का औसध हो तुम
जो या तो मन के भोर पर टंगा होता है
चंचलचित्त और चपल बनाने को
या फिर उस बेचारी साँझ पर
मरहम की तरह
जिसके आगे रात के सिवा कुछ भी नहीं

दुःख-सुख के अनुभव
के बीच का वो अदृश्य सेतु हो तुम
जो दुःख को सुख से
और सुख को दुख से
जोड़े रखता है
मेरी आस्था, संकल्पों को
अगोरे रखता है

शांत एकांत की नीरवता का
वो चरम बिंदु हो तुम
जिसमें बस आत्मा से
जीया जा सकता है
शरीर जो एक नश्वर है
नश्वर ही रहे तो बेहतर है

पता नहीं ये प्रेम है
या प्रेम की विविध छाया
जो हर रूप में
तुम्हें मेरी भावना के अंक में
रख जाती है
मैं खोजता रहता हूँ
तुम्हें इन छायाओं में
और तुम उभरती रहती हो
नए रूप में, नई दिशाओं में।

मृत्युंजय
22.1.2018

Monday, June 25, 2018

राजा का रथ

सपने में देखा
एक राजा का रथ दौड़ रहा था
पीछे ग़ुबार में लिपटी
दौड़ रही थी उसकी सोच;
बँटी थी उसकी रियासत
आयतों में, चतुर्भुजों में
कुछ भी नहीं था गोल या सुडौल
केवल थे बस तीखे कोण
जो हिलेंगे तो काटेंगे
ठोस-तरल जो कुछ भी है
सब आपस में बाटेंगे।
फिर जो होना था वही हुआ
तीखे कोण लगे काटने
आयतों को, चतुर्भुजों को
राजा का रथ दौड़ रहा था
दौड़ रहा था, दौड़ रहा था।

तीखे कोणों से कटकर
रक्त बह रहा 
आयतों से, चतुर्भुजों से
लेकिन राजा का रथ दौड़ रहा था
सहस्रबाहु राजा 
अपनी सारी भुजाओं से 
बरसा रहा था कोड़े, रथ के घोड़ों पर
राजा का रथ दौड़ रहा था।
दौड़ दौड़ कर अब रथ
आंधी में बदल गया था
धुआँ उठने लगा जब चारों तरफ़
जल रहे थे वनस्पति, पंछी भाग रहे थे
रथ का सारथी तो कब का उड़ गया था
लेकिन राजा को मज़ा आ रहा था
फुत्कारती हवा, चिल्लाते लोग
अररा कर गिरते पेड़, लहरा कर गिरती लाशें
सबमें उसको दिख रहा था
एक सर्वशक्तिमान राजा का पराक्रम,
एक उज्ज्वल भविष्य - अपनी प्रजा का,
आयतों का, चतुर्भुजों का;
बस गोल कुछ नहीं था, सुडौल कुछ नहीं था।

होश जब आया राजा को
चारों ओर मरुभूमि थी
तपती हुई एक बालू राशि पर
उड़ती हुई धूलि थी
तभी पुकारा एक पंछी ने
निपट अकेला, बिन संगी के
-"चलो ए राजा, 
ले चलता हूँ तुम्हें एक वन में
जहाँ छाया है, पानी है
हरियाली से छन कर गिरती
किरणें कुछ दीवानी हैं"
सब कुछ खोकर, भूखा-प्यासा
राजा दौड़ा पंछी के पीछे
गिरते-पड़ते, मरते-मरते
जब राजा पहुंचा उस छोटे वन में
पूछा पंछी से -
'कौन हो तुम?
क्यूँ किया यह सब?"
पंछी बोला-
"अपनी रानियों के लिए
जो क्रीड़ा क्षेत्र बनाया तुमने
काट गिराया जिस वन को
उस वन का मैं पंछी हूँ!
अवशेष हूँ मैं उस वन का
जिससे तुम गरिमा पाते थे।
और वो देखो, वो जलाशय
समझो इसका आशय,
जल जो था तुम्हारे वन का
वो भी सूख उड़ा आकाश को
बरस कर बन गया इस उपवन का।
क्या तुम्हें पता है
अब तुम बस 
एक मरुभूमि के मालिक हो
जहाँ न वन है, न ही जलाशय
ना उद्योग न जीवन है
ना जाने इस विजय-रथ पर सवार
तुम किसे जीतने निकले हो!"
(मृत्युंजय)

मैं जी रहा हूँ जीने के विरोध में

हलक-हलक में सूख कर
प्यास बन
पलक-पलक पर भींग कर
कुछ आस बन
फलक-फलक पर रेंग कर
जैसे किरण
लीन हो ज्यूँ अनवरत
एक शोध में
मैं जी रहा हूँ जीने के विरोध में।

छलक-छलक कर आँख से
आँसू के कण
झलक-झलक पर मर मिटा
आवारा मन
तुनक-तुनक कर भागती 
जैसे पवन
थक कर आ बैठी हो 
मेरे गोद में,
मैं जी रहा हूँ जीने के विरोध में। 

मैं प्रेम करना चाहता हूँ

एक अनघ हृदय
और साफ़ दॄष्टि लिए
मैं मनाना चाहता हूँ
तुम्हारे सौंदर्य का उत्सव
धमनियों में उमड़ते लहू का
खींच कर रास
ताकि उलीच कर 
अपनी गाढ़ी तरलता
वो तुम्हें 
अपने मोह में न लपेट लें।

घनी बरौनियों की छाया में
पलकों के उत्थान-पतन से
रह-रह विसरित संचार 
की भाषा पढ़ना चाहता हूँ
निकटता का वो गणित भी
फिर से सीखना चाहता हूँ

तुम्हारी त्वचा के अस्तर से 
अब भी झांकती है जो चांदनी 
कभी मेरे झूठ को 
सच की रोशनी से सहलाती 
तो कभी जीवन के घूरे पर पड़े  
दायित्व के टुकड़े चमकाती,
मैं उसमें नहाना चाहता हूँ।

दुविधा में पड़ा 
वक्र दिशाओं में तना हुआ
सपनों के काँपते रोम लिए  
मैं जड़ नहीं
मुक्त झूलते 
पत्तियों-सा हिलकर 
छूना चाहता हूँ, फिर से  
तुम्हारे दो आँखों में बसे 
जीवंत महाद्वीपों का जगत।

प्रेम में पगा 
प्रेम में ही विभक्त 
प्रेम से भरा 
प्रेम से ही रिक्त 
मैं तुमसे प्रेम करना चाहता हूँ। 

ये कैसी भूल-भूलैया

ये कैसी भूल-भूलैया
छत्ता छोड़ के बिढ़नी नाचे
घर में ता-ता-थैया

राह चले तो माथा फूटे
घर बैठे तो डाकू लूटे
बह गई बाढ़ में खेती लेकिन
सूखे हैं ताल-तलैया
ये कैसी भूल-भूलैया।

मुल्ला-पांडे सर पर चढ़ गए
धर्म से बाजार भर गए
अमन के नाम पर बांध गए 
मेरे खूँटे पर अपनी गैया
ये कैसी भूल-भूलैया।

जल काला है, हवा भी काली
हर कोई देता है गाली
परोपकार के नाम पर केवल
बँटता है भीख रुपैया
ये कैसी भूल-भूलैया।

दारू पी कर बकते साँचे
ज्ञान नहीं पर पुस्तक बाँचे
समझा कर सबको सीधा 
ख़ुद चाल चलें अढ़ैया
ये जीवन भूल-भूलैया।

विकास की बाढ़

इससे पहले कि मैं पहचानूँ
मेरी एक छोटी, राई-सी ज़रूरत
एक पर्वत बना
उसकी प्रदर्शनी लगा देते हैं
मुझे पता ही नहीं अपनी जरूरतों का
और वो बूँद-बूँद इकट्ठा कर
एक बाढ़ बहा देते हैं चारों ओर
स्वाभाविक है
इसमें मैं और मेरे जैसे कई
डूबने लगते हैं
तब हमारी ओर वो
विकास का एक तिनका बहा देते हैं
हम तैरते हैं, लड़ते हैं, थकते हैं
ज़रूरतों की बनाई इस बाढ़ में
विकास के छोटे तिनके पर लपकते हैं
थके हाथों से 
उनके विकास की भुजाएँ गढ़ते हैं।
हमारी ज़रूरतें कम नहीं होतीं
और उनका विकास बढ़ता ही जाता है
हम डूबते ही जाते हैं
कभी ज़रूरतों की बाढ़ में
कभी विकास की आड़ में।

मृत्युंजय
22 जनवरी 2018

तुम

महज़ ख़याल ही नहीं,             
शोर-शराबे से भरे मुझमें               
एक स्थिरता हो तुम,                    
जो जड़ में अनुपस्थित हो कर भी 
मेरे चेतन को हिलाता रहता है          
इस ज़माने से लोहा लेने का 
हौसला बढ़ाता रहता है।

क्षितिज पर बेलौस पसरी
लालिमा का औसध हो तुम
जो या तो मन के भोर पर टंगा होता है
चंचल-चित्त और चपल बनाने को
या फिर उस बेचारी साँझ पर
मरहम की तरह
जिसके आगे रात के सिवा कुछ भी नहीं

दुःख-सुख के अनुभव
के बीच का वो अदृश्य सेतु हो तुम
जो दुःख को सुख से
और सुख को दुख से
जोड़े रखता है
मेरी आस्था, संकल्पों को
अगोरे रखता है

शांत एकांत की नीरवता का
वो चरम बिंदु हो तुम
जिसमें बस आत्मा से
जीया जा सकता है
शरीर जो एक नश्वर है
नश्वर तक ही रहे तो बेहतर है

पता नहीं ये प्रेम है
या प्रेम की विविध छाया
जो हर रूप में
तुम्हें मेरी भावना के अंक में
रख जाती है
मैं खोजता रहता हूँ
तुम्हें इन छायाओं में
और तुम उभरती रहती हो
नए रूप में, नई दिशाओं में।

मृत्युंजय
22.1.2018

गणतंत्र की कहानी


तुमने देखी ही नहीं वो निग़ाहें
आंसुओं में तैरती पुतलियों की आहें
मजबूर, बे-आवाज़ वो सिसकियाँ
जो फूट पड़ती हैं गाहे-ब-गाहे
कभी किसी फाँके में पड़े घर से
तो कभी लाशों से अंटे तलघर से
कभी हुक़्मरानों के रानों में दबी
तड़फड़ाते कबूतरी के सर
तो कभी अजगरों के
जबड़े में 
टूटते लाचार सपनों की हड्डियाँ
तुम्हें क्या,
तुम खेलो, मेरी छाती पर कबड्डीयाँ।
जब भर जाएगा मन
होकर पस्त कराहेंगी जब मांसपेशियाँ
तब क्षमा की मुद्रा में खड़े कहना -
"अब मुझे आराम चाहिए!
बहुत काम किया,
आगे बढ़ते देश के क़दमों को
थोड़ा विश्राम चाहिए!"
और हम भी
हमेशा की तरह
मढ़ कर सारा दोष अपने नसीब पर
डालेंगे मिट्टी 
अपनी-अपनी आशाओं के क़ब्र पर
इंतज़ार में उस फफूँद-मसीहा के
जो 
सोख कर, चबा कर 
हमारे सामर्थ्य की जमा-पूँजी
सूखी संठियाँ सौंप देता है
हमारे बच्चों के हाथों में
जिसमें पहना कर कोई झंडा
करते वो वाग-वितण्डा,
देकर हमीं को गाली
बन कर खड़ा सवाली
बेवड़ा, हमारा बेटा
(या पड़ोस की बेटी)
नथुने फुलाए मरखंड
एक सांढ़-सा टूट कर हम पर
दरके विश्वास में
भर जाते हैं घृणा का दहन
और नहीं होता सहन।


तुमने सुनी ही नहीं वो कराहें
नींद को काटती दंराती-सी 
चुभती हुई वो बाहें
जो चाहे प्रेम से जकड़ ले
या तिरस्कार से झटक दे
देती है हमारा अंतर नोंच
बस खरोंच ही खरोंच।
किसान बने या व्यापारी
विज्ञानी या साहित्यकार
या शायद दार्शनिक,
अफ़लातून, निर्विकार
सबके गले पर झूलता है आरा
एक ऐसी मौत का
जो सर्वविदित होकर भी
रहस्य है
अपनी ही खड़ी फ़सल में जैसे
दस्यु खड़ा हो

किस-किस को हम सराहें
कितनों की नीयत थाहें,
नंबर एक, बिकेगा
नंबर दो, बनेगा दास
नंबर तीन, अंधेरे गलियों की चमेली
नंबर चार, राज पथ की रातरानी,
यही है 
इस गणतंत्र की कहानी
जितना मुँह फाड़ो
उतना भरेगा
जितना पेट पीटो
उतना ही दुखेगा
ये भावना कुछ भी नहीं
दृश्य जगत की अदृश्य माया
जिन्न और पिशाच जैसे
खेलते हों
एक अशरीरी खेल
बस छाया ही छाया।

अपराध भाव

मैं बैठा हूँ
एक ऐसी भूमि पर
जहाँ सब कुछ हरा है
हरे में हरे के अनगिनत
रंगों की छाया लिए
किरणों के संग खेल रही 
हरी धरा है,
मनुष्य के रक्त-धमनियों सी
शाखा-विन्यास लिए लेकिन
कुछ नंगे भूरे 
कृशकाय लंबे
पेड़ खड़े हैं
अपने नंगेपन के कारण
दिखते घने हैं।
और इनके बीच
इनकी ही छाया के खिलौने 
कहीं लंबे, कहीं छोटे 
तो कहीं बौने
लगे हैं अपनी जगह बनाने में
भूरे और हरे के बीच
तालमेल बिठाने में।

जैसे एक काली काया
जीवन से जुड़ी
मुँह छुपाए डोलती है
पार्श्व में रह कर भी
आगे का सब बोलती है।


मैं बैठा हूँ
और देख रहा हूँ
भिन्न-भिन्न जाति, रंग 
और बोली वाले पक्षी
रत हैं, अनवरत संभाषण में
कोई किसी की नहीं सुन रहा
कोई किसी को नहीं गुन रहा
बस अपने-अपने आशय में
डूबे, रात में
सब एकमेक हो सो जायेंगे
पक्षी भी मानव हो जायेंगे
अपने नियति की समरूपता में,
विविधता में, विरूपता में।
मैं बैठा हूँ ऐसी भूमि पर
जहाँ सौंदर्य भी
अपराध का भाव जगाता है।

मृत्युंजय
साइफोंग-इन्थोंग (तिनसुकिया) में 
2nd April 2018