Tuesday, December 12, 2017

फूट गए भाग

तुम्हारे हर झूठ का सच
हम जानते हैं
तुम्हारे हर सच में
झूठ की जो छाया झूलती है
उसे भी देखा है;
झूठ का सच, सच का झूठ
जैसे सागर की लहरें मारती हिलकोरा
वापस खींच ले जाता पानी सब 
फेंक जाता है 
बालू का ढेरा।
हत्या का कोई रूप
छुपा नहीं हमसे
लाचारी तो जैसे मियादी बुख़ार
हर दिन चढ़ आती है - दो-चार बार
फिर भी हम चूके नहीं
अपनी आस्था जताने से
देश पर, देश के तंत्रों पर
बहुत विश्वास है हमें
जादू-टोना, मन्त्रों पर।
लाचारी अब बिमारी नहीं
बिमारी ही अब लाचारी है
ऐसी ही एक सोच से
सीखा हमने, चुप रहना
चुप रहना तब तक
जब तक
अपने ही घर में
ना लग जाए आग
समझ आया,
क्यूँ कहते हैं लोग बहुधा
कि फूट गए भाग?

Tuesday, November 7, 2017

एहसास का पुल

एहसास का पुल
इतना लंबा हो जाता है
तुमसे मिलकर
कि जैसे 
स्वयं के बीच ही
बन गई हो एक दूरी
एक छोर पर खड़ी
प्रतीक्षा
दूसरे छोर की बाहों में
लिपटने को आमादा
हिला जाती है पुल
और बह जाता हूँ
मैं
गिर कर पुल से
आकांक्षाओं की 
हरहराती नदी में

Monday, November 6, 2017

बिल्ली के पँजों में फँसा सूरज

तुम्हारे
उरोजों 
की मांसल खाड़ी में 
हर मशक्क़त 
से उपजा 
पसीना 
इत्र में नहाया 
एक फूल बन जाता है 
और तुम्हारी 
साँस की गरमी में 
सराबोर 
हर बबूल 
एक मुलायम साया, 
बस ज़ख्म 
नहीं भरते 
तो उस मासूम के 
जिसका बाप
सरहद से लौट 
घर नहीं आया 
और माँ 
अपनी आँखों में 
सवाल टाँगे 
सुन रही है 
ज़माने भर की तक़रीर 
जिसमें 
कोई नहीं है ज़िक्र
उसके राँझे का 
और ना ही कहीं 
उसकी छाती में 
बिलखती हीर का
तुम्हारे गुदाज़ 
इरादों से 
पसीने की बदबू 
भले ही मिट जाए 
उसका खारापन 
फिर भी नहीं जाता
लुटी हुई इज़्ज़त 
और 
देह से निकली जान 
का कोई नहीं है नाता 
तुम्हारे उस 
मांसल आगोश से 
जिसमें 
सूरज का तेज 
बिल्ली के पँजों में फँसा
बस खरोंचता है
चेहरा
जलाता है
सीना।

संस्कृति का भस्म

अकस्मात् देख रहा हूँ
बुरादों-से भुरभुरे लोग
हथियारों में परिणत हो गए हैं
और दीमकों की बामी
लिजलिजे केंचुओं से भर गयी है,
मवेशी देवताओं को खदेड़
गर्भ-गृह हथिया कर बैठ गए हैं
और देवता
निराकार, अदृश्य 
आकाशवाणी की तरह 
सुनने वाले कान ढूँढ रहे हैं
भगोड़ा चाँद 
त्योहार में घर लौटने की
अर्ज़ी लगाए बैठा है
संततिहीन लोगों के इजलास में
नदियों का नमन 
करने उतर आये हैं
बादलों से झूम-झूम झरते
विनाश के वृत्त -सा
मुँह फाड़े 
विकास के काले करैत
खेद रहे हैं मीलों तक
करैल कीचड़ में सनी 
छलछल उछलती
तड़पती मछलियाँ
लचीले अजगर-सा
काढ़े परिधि
क्षितिज पर का आसमान 
पड़ गया है साँवला
रात लेकिन 
भर गई है उजास 
उन्मत्त मद्यप 
बेरोज़गार
उत्सव मना रही है
तीली जलाकर आस
नदियों के तटों पर
लाशों का 
शेष-क्रिया सम्पन्न कर
उलीच रहे हैं लोग
सारा कूड़ा-करकट
प्रजातंत्र की
कृशकाय नदी में,
बहती जा रही है
नदी
अपने सतह पर
थरथराते सपनों का
प्रतिबिम्ब गढ़े
इस आस में 
कि चाँद
लौट सके अपने घर,
मवेशी अपने स्थान पर,
देवता अपने गर्भ-गृहों में
और
मछलियाँ
काले करैत के जबड़े से
बच कर
नदी के प्रवाह में,
जिसमें पानी
बस घुटने भर ही रहता है
संस्कृति का भस्म
इसी में तो बहता है।

बस छाया ही छाया


तुमने देखी ही नहीं वो निग़ाहें
आंसुओं में तैरती पुतलियों की आहें
मजबूर, बे-आवाज़ वो सिसकियाँ
जो फूट पड़ती हैं गाहे-ब-गाहे
कभी किसी फाँके में पड़े घर से
तो कभी लाशों से अंटे तलघर से
कभी हुक़्मरानों के रानों में दबी
तड़फड़ाते कबूतरी के सर
तो कभी अजगरों के
जबड़े में 
टूटते लाचार सपनों की हड्डियाँ
तुम्हें क्या,
तुम खेलो, मेरी छाती पर कबड्डीयाँ।
जब भर जाएगा मन
होकर पस्त कराहेंगी जब मांसपेशियाँ
तब क्षमा की मुद्रा में खड़े कहना -
"अब मुझे आराम चाहिए!
बहुत काम किया,
आगे बढ़ते देश के क़दमों को
थोड़ा विश्राम चाहिए!"
और हम भी
हमेशा की तरह
मढ़ कर सारा दोष अपने नसीब पर
डालेंगे मिट्टी 
अपनी-अपनी आशाओं के क़ब्र पर
इंतज़ार में उस फफूँद-मसीहा के
जो 
सोख कर, चबा कर 
हमारे सामर्थ्य की जमा-पूँजी
सूखी संठियाँ सौंप देता है
हमारे बच्चों के हाथों में
जिसमें पहना कर कोई झंडा
करते वो वाग-वितण्डा,
देकर हमीं को गाली
बन कर खड़ा सवाली
बेवड़ा, हमारा बेटा
(या पड़ोस की बेटी)
नथुने फुलाए मरखंड
एक सांढ़-सा टूट कर हम पर
दरके विश्वास में
भर जाते हैं घृणा का दहन
और नहीं होता सहन।

तुमने सुनी ही नहीं वो कराहें
नींद को काटती दंराती-सी 
चुभती हुई वो बाहें
जो चाहे प्रेम से जकड़ ले
या तिरस्कार से झटक दे
देती है हमारा अंतर नोंच
बस खरोंच ही खरोंच।
किसान बने या व्यापारी
विज्ञानी या साहित्यकार
या शायद दार्शनिक,
अफ़लातून, निर्विकार
सबके गले पर झूलता है आरा
एक ऐसी मौत का
जो सर्वविदित होकर भी
रहस्य है
अपनी ही खड़ी फ़सल में जैसे
दस्यु खड़ा हो

किस-किस को हम सराहें
कितनों की नीयत थाहें,
नंबर एक बिकेगा
नंबर दो बनेगा दास
नंबर तीन अंधेरे गलियों की चमेली
नंबर चार, राज पथ की रातरानी,
यही है 
इस गणतंत्र की कहानी
जितना मुँह फाड़ो
उतना भरेगा
जितना पेट पीटो
उतना ही दुखेगा
ये भावना कुछ भी नहीं
दृश्य जगत की अदृश्य माया
जिन्न और पिशाच जैसे
खेलते हों
एक अशरीरी खेल
बस छाया ही छाया।

Wednesday, February 22, 2017

तुम्हारा प्रणय

चाँदनी की उड़ती
झीनी चादर
जब सोख लेती है
गर्म दिन पर फैले
स्वेद का खारापन,              
मीठी मिश्री की डली
तुम्हारा प्रणय
भर जाता है रोम-रोम।

ठंढे ज्वर से 
कंपकंपाती धमनियों में
थरथराता उतरता है
तुम्हारे छुवन का एहसास
शोध को उतावले
अंग-प्रत्यंग
जकड़ हो जाते जब एकमेक
लपलपाती जीभ काढ़े
भर जाता है लालसा का व्योम।

प्रेम-लीला में पगा
जीव                                                                                 
ऊब में ढल
वितृष्णा के अम्ल में गल
जब बह जाता विकार-सा
अवतरित होता है तब
अमूर्त, अगोचर प्रेम का
अनहद ध्वनि सा गूँजता ॐ।

(मृत्युंजय)

Painting by Mandalas Carolina Lerose

Tuesday, January 3, 2017

तू हो गया है ग़ुमराह


मुझे पता है तेरी चाह
तू हो गया है ग़ुमराह।
चिलचिलाती बालू-राशि पर
निकल कर नंगे पाँव
तू माँगता जीवन से पनाह,
मुझे पता है तेरी चाह
तू हो गया है ग़ुमराह।

गोबर-कीचड़- कादो
हमेशा ही सावन-भादो
जैसी गाँवों की सड़कों पर
उलझनें लादे फँसी एक बैलगाड़ी 
पेड़ की फुनगी पर बैठे
चाँद के बगुले से कहती
कोई सूझे, तो बताना मुझे भी राह
मुझे पता है तेरी चाह
तू हो गया है ग़ुमराह।

कौन जाने 
कौन किसका काँधा पकड़ कर चल रहा है 
हर आदमी बस ढल रहा है
धूप-सा कहीं 
तो कहीं चाँदनी-सा 
ठहरने को संभल रहा है,
फिसल कर गिर रही आशाएँ 
रह-रह कराह, 
मुझे पता है तेरी चाह 
तू हो गया है ग़ुमराह!

Tuesday, November 29, 2016

हम बोलेंगे

हम बोलेंगे
कि वो
जो एक गोली से मरा
एक दुर्घटना का शिकार था
उसके बारे में
सोचना ही बेकार था।

हम बोलेंगे
कि वो सब
जो पंक्तियों में पड़े हैं
अपनी मर्ज़ी से खड़े हैं।
कोई काम नहीं था उनको
इसलिए
बदतमीज़ी पर अड़े हैं।

हम ये भी बोलेंगे
कि गलता हुआ हिमालय
एक अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का
कुचक्र है
हम ग़लत समझे
हमारी बुद्धि ही थोड़ी वक्र है।

हम बोलेंगे, यह भी
कि हमारे आसमान में
जो भरा है
भूरा धुआँ
वो प्रकृति के
नैसर्गिक नियमों की पहचान है
डरना नहीं
मौसम का ये नया दान है।

हम बोलेंगे, कई बार
कि मौत और लाचारी की
सारी बातें
बस कोरा गप्प है
वरना क्यूँ नहीं बताया
जब सबके हाँथ में अब
ट्वीटर, फेसबुक, व्हाट्स अप है?

हम बोलेंगे, शायद यह भी
कि आसमान में सुराख़
वैज्ञानिकों की लापरवाही है
वरना ज़मीन पर
किसे पता है
कि आसमान में केवल स्याही है।

हम सब कुछ बोलेंगे,
लेकिन पहले
मेरा गला तो छोड़ो
कि थोड़ी साँस आए!
(मृत्युंजय)

Monday, November 14, 2016

समय

समय 
जैसे बैठ गया है आकर
अपाहिज, मेरी गोद में
बीत कर, या बिता कर
सब कुछ 
उस शोध में
जहाँ
शरीर और आत्मा
दोनों का ही
विलय हो जाता है।
ह्रदय
बच जाता है
अकेला
जैसे
खुले में
मदारी का खेला।
डमडम डमरू
बजता रहता है
और
निसंग एक बंदर -
ह्रदय,
इक अनजाने भीड़ में घिरा
नाचता रहता है
न जाने किसके लिए
न जाने क्या-क्या लिए।
(Mrityunjay)

चाँद मेरे क्षितिज का

मेरी छत से सुपर मून / रक्तिम चाँद 



ऐ  चाँद,
तू हंस है मेरे क्षितिज का!
सपनों की मेरी फुनगियों पर बैठ
फड़फड़ाता, 
श्वेत अपने गात हिलाता, सबको जगाता!
तू हंस है मेरे क्षितिज का!

कभी हवा, कभी कुहरा, कभी बस 
दिव्य तारों को लपेटे,
चाँदनी में भी अँधेरे का तनिक आभास फेंटे
मेरी दुनिया को तू ऐसे सजाता, थोड़ा छुपाता।
सपनों की मेरी फुनगियों पर बैठ
फड़फड़ाता,
तू हंस है मेरे क्षितिज का!

गाँव के पीपल में फँसा 
बरगदों के बीच होकर 
तू पोखर में जा धँसा,
निर्गंध एक सुवास-सी 
उग रहे प्रकाश-सा  
प्रथम प्रेम की लहरियों से सुर मिलाता, मुझको रुलाता। 
मिट रहे गंधों के 
श्वेत अपने गात हिलाता, मुझको जगाता!
तू हंस है मेरे क्षितिज का!




Monday, November 7, 2016

कविता


उस एक दिन
बड़ी कच्ची और लचीली
उम्र में
तुम्हारी छुवन की तरह
आयी थी कविता
मेरी खोज में।
पता नहीं कहाँ से -
उड़ते हुए पतंग से जुड़े
कटे हुई धागे के संग
ये कहने
कि पतंग नहीं कटती,
कटते हैं बस धागे,
ये बात है तब की
जब हम
पतंग लूटने भागे।
साँय-साँय
भाग रही हवा जो मेरे संग,
उसी में लिपटा निःशब्द,
सन्नाटा या शून्य
की तरह लिपट गयी थी कविता
मेरे उस चेहरे को टटोलते
जो मेरा था ही नहीं
जैसे मस्त
तिरते हुए पतंग से लगा
एक कटा हुआ धागा
जो किसी का नहीं होता।
मैं अबोला, मैं अवाक्
आँख से अँधा
हाथों से शून्य टटोलता
और मन से मूल्य
कि तभी
कोई छू गया देव-तुल्य,
मेरी आत्मा काँपी
एक अनजाने डर से
शरीर तपने लगा
उस छुवन के ज्वर से
और मैं बड़बड़ाया -
कुछ गूढ़
किन्तु निरा बकवास
या कुछ ऐसा विशुद्ध ज्ञान
उस जीव का
जो कुछ नहीं जानता
कुछ नहीं पहचानता।
एक स्वर्ग जैसे खुल गया
इन्द्रियाँ सब गल गईं
नक्षत्र, काँपते वनस्पति, तारे
छिदे-भिदे सारे
छलनी-से छींटते
कुछ आग, कुछ पानी
कुछ बादल,
कुछ पुष्प-दल,
लोटती रात पर
जुगनुओं-सा चिपका उजाला
सब उसकी
माँसल भुजाओं में सिमटने लगे।
मैं जैसे एक अतिसूक्ष्म जीव
रहस्य की छाया
अजीव बन तैरता
सजीव एक माया
नक्षत्रों पर तनी
आकाशगंगा में
धुएँ-सा टूटा
हवा पर बिखरा मेरा ह्रदय
एक प्रेम-कथा
सुनाता है
सारे ब्रह्मांड को।

Tuesday, October 25, 2016

ज्योति

ज्योति

उमड़ता ज्योति का भँवर
तम को पकड़।
तम, तमस ही शाश्वत
रूप है प्रकृति का
वो धरा हो, व्योम हो
या तल हो
सागरों की तलहटी का।
किन्तु अँधेरा तिलस्मी
भी खोजता है, एक मुट्ठी रश्मि
जिसके असर से देख पाएँ
हम अपने अंदर की नमी,
कहना कठिन है
कौन है इस जगत की जननी -
तमक कर अकड़ा हुआ तम
या फिर ज्योति से पुलकित
एक अगोचर
जीवन का जो भान प्रथम!
हम जीवित-से लोग
हर क्षण जो साँस लेते
ये गति तो
आ नहीं सकती है तम से
प्राण से वंचित
किसी प्राणी अधम से।
इसलिए तो कह रहा हूँ -
भर दो तम को
रश्मियों से
ज्योति से खलखल
उमड़ती उर्मियों से
देख लेने दो अंधेरों को
तनिक जीवन का रूप,

केवल अँधेरा ही नहीं
हम सब में है
एक मुट्ठी धूप
उग रही जो हर तरफ
इस जगह या उस जगह
आदमी के धमनियों के
रक्त में बन कर सुबह। 
ज्योति ही जीवन का परिचय
ज्योति में जीता न संशय,
ज्योति ही पूजा का उपक्रम
ज्योति ही प्राणों का संगम।


***********************

Tuesday, March 8, 2016

आस के पलाश

कलरव या शोर
जो भी हो
हुई तो भोर,
वरना रात
बड़ी लंबी हो रही थी।
कल के दिन से
साँझ तक
हवा में झूलता
रक्तिम पलाश
जगा तो गया था कुछ आस
वसंत-सा कोई
खिड़की खटखटा कर
ये भी दे गया था आभास
कि कुछ त्योहार-सा
घटित होने वाला है,
लेकिन मन था
चौकन्ने रहने का
चुपचाप चिल्लाते रहने का।
फरफराती हवा
सरसरा सरसरा कर
उड़ने को कह जाती
लेकिन आँखें थीं
जो देखने में लगी थी
पतझड़ में झड़े
पत्ते
बिखरे, ढेर बने
प्रतीक्षा में जो थे
होने वाली अगजनी के,
शाखों के पोर-पोर से
झूलते, नवजात, कोमल
पत्तों का गुलदस्ता लिए
खड़े वृक्ष
जैसे बढ़ाए अपना हाथ
उनके प्रति
जिनसे छूट गया है साथ,
विलाप ही विलाप
बिछा था जहाँ चारों ओर
वहाँ तुम
अब भी खड़ी हो
अपने आँचल से ढाँके
रंगों में सने 
आँसुओं से धुले
आस के पलाश। 
 *******************
(मृत्युंजय )
८ मार्च, २०१६

(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)

Tuesday, November 3, 2015

Addiction and the addict

Addicted to nicotine
I inhale you
Drags after drags
Chocking my lungs
With patches of vices
Unable to withhold
I spew grey smoke
And watch them
Spiralling
Going up and away
Making shapes
Of contaminating hope
From grey to brown to blue
Digging in to the void
Of a sky
Spread around me
With limiting silhouttes
Of silently watching trees
Testimony
Of my wild thoughts, wicked intentions
And a love
That fills the breach
Like a transparent glue
that binds us together
The addiction
And the addict.

(Mrityunjay)

Wednesday, September 9, 2015

तुम्हारे मुस्कान का विस्तार

कुछ हिले
तो देखूँ
बादलों के पीछे
तुम्हारे मुस्कान का विस्तार।
हवा है
जो ठहरी है तो ठहरी है
सत्ता है
जो हर बात पे बहरी है।
बाहर का सत्य
दिखाई नहीं देता
अंदर का कुछ भी
सुनाई नहीं देता
मैं तुम्हारा,
पर छूटा जा रहा हूँ,
एक ऐसा आगत
जो बिन आये ही टल गया
एक भविष्य
जो विगत में ही ढल गया
तुम अपनी जीत में
हर हार को नकारते
चले जा रहे हो
उस धुँधले क्षितिज की ओर
जहाँ की भोर भी
अँधेरी होती है।
मैं छूटा जा रहा हूँ
पर टूटा नहीं हूँ
अब भी
प्रतीक्षा में हूँ
कि जब बादल हिलें
तो देख पाऊँ
तुम्हारे मुस्कान का विस्तार।
(मृत्युंजय)


Thursday, July 23, 2015

झेलम के प्रति (To JHELUM)



एक ऐसे समृद्ध भू-भाग में
प्रकृति जहाँ
कल्पना के बिम्बों-सी
रचती है हर पल एक रचना,
झेलम,
तुझे ही नहीं आया बचना?

काली-करैल मिट्टी के
तटों से बँधी
कृशकाय काया में
उमड़ता मटमैला जल
जैसे नाचता कोई नीम-पागल।
हंसी उड़ाते,
संग भागते
लम्बे पोप्लार के पेड़ कतार में,
सुना है
उनकी भी नस्ल डुबो दी
तुम्हारे लोगों ने
व्यापार में।
सिरमौर
तुम्हारी बर्फीली चोटियों पर
अहर्निश चलती है
फौजी बूटों की
उठा-पटक
लगी रहती है
उनको
घुसपैठियों की भनक
झरनों के छलकते यौवन में
अब अल्हड़पन कम
धधकती
विपुल वासना
अबोध हवस का तम

पशमीना, सेव, अखरोट,
नक्काशी भरे हाथों की ओट
में
सर्दियों की कांगड़ी की तरह
छुपके पनपते अंगार
आराम देने की आड़ में
रोग-व्याधि के आगार।

झेलम,
सुना है अतीत में
कबीलों से लेकर मीलों तक
प्रेम की सदाशय लहरियाँ गाते
झूमते बौद्ध, हिन्दू,
ईसा के अनुयायी
यहूदियों की
कुछ खोयी
टोलियाँ भी यहाँ आयीं।
सतलज, चेनाब
और रावी के संग
तुमने घोले बड़े सारे रंग;
फिर ऐसा क्या हुआ
इतिहास में
कि सबकुछ
परिणत हुआ परिहास में?

झेलम,
पूजा करके कोई खून करे
या नमाज पढ़के जिबह,
बढ़ता है दोनों से कलह।
इसी कलह की
प्रताड़ना में जल
सूख कर तुम बन गयी
नदी से नाला,
तुम्हारी घाटियों में भी
भर गया है
इस देश का घोटाला।
नहीं तो
सभ्यताओं का पोषक
तुम्हारा जल
यूँ विष की तरह काला क्यूँ होता
तुम्हारे घरों में पका
सुस्वादु वाज़वान
किसी और का निवाला क्यूँ होता?

                            (मृत्युंजय)

Monday, March 2, 2015

फिर तुम्हारी याद आई (I remember you again)

बड़ी धुली-धुली सी रात है ये
बारिश की बौछारों से
बहती हुई बयारों से
जैसे धो गया हो कोई
रात पर बिखरी रोशनाई
फिर तुम्हारी याद आई।
चुपके से झड़ गये हैं
कुछ आम के मंजर
कुछ फूल
जो टहनियों परसूखे लगे थे
आबरू की शाख पर
यूँ ही टँगे थे
अकस्मात्
बिजली और बादलों की धनी
मौसम की खुरदरी एक ओढ़नी
खरोंच गयी हो जैसे
चेहरा यादों का
कसमसाती गुनगुनी
गर्मी से
ऊब रहे वादों का
हथेलियों से
मुँह ढाँके
सीने में क़ैद साँसें
जैसे टटोलती हों
अपनी परछाईं,
फिर तुम्हारी याद आई।
(मृत्युंजय)


Painting by Luise Andersen

MK Singh's Dev Sabha HD

Sunday, February 22, 2015

Bon Voyage to Ishaan

I never wrote
a letter to you!
Or i did, a few?
When you went away
Getting disgruntled
And bizarre
By our methods of parentage.
I still wonder
What would it be
If you remained away
But for providence
That came
Like a timely rescue
Giving both of us
The desired break.
But i think
I never wrote to you
There was nothing to make.

For god sake
Don't ever think
We're harsh to you
As we're equally harsh
On everything that came our way
May be, to see you
As what you ought to become
Though with no final shape
Like a runner
Practicing for a match run
Not for a trophy.
But i think
I never wrote to you.
I gave you sermons
Filled with parables
Which i never understood myself
Never did i follow any
Because i was a drifter
Like logs in a river, too many
I enjoyed you growing
In my lap
And in my surrounding
Never ever thinking
What will happen
Once you grow,
After all
Every bird flies
Swan or crow.
But i think
I never wrote to you.

When i pressed your back
Or treated an injury
Hope of happiness
Acted as an usurer
Piling up compound interest 
On the greed of loving ceaselessly
While I learnt
New words, language, images and taste
I wondered
What would i be without you, a waste.
But i think
I never wrote to you.
right since i called you
the Little Confucius
God gracious,
i have seen it all -
mischief, anger, deceit, perseverance,
melting eyes and toughened countenance,
your love for a single malt
and passion for relationship
swinging between
a common taste of Old Monk rum
to diverse ways of living
i have seen it all.
but i think 
i never wrote to you.

you fell, i got hurt
you cried, my peace dried
i laughed at all your glee
but never could see
that a rainbow 
is a seasonal phenomena.
we have harsh winters too
with buried hope of spring
like a dying patient
still breathing
for a miraculous recovery.

No, 
i should never write to you
it is better, a 'will' remains unread
for it makes, even love, 
a commercial transaction
feelings have no direction.